अकबर के ख्वाबों की नगरी फतेहपुर सीकरी क्यों प्रसिद्ध है?

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आगरा का खूबसूरत ताजमहल देखने के बाद अगर आप सोच रहे हैं कि इसके बाद कहाँ जायें तो मैं आपको यही सलाह दूँगी कि आप उत्तर प्रदेश के फतेहपुर सीकरी में बसी मुगल शासन की खूबसूरत पर अब वीरान हो चुकी राजधानी को देखने के लिए एक दिन ज़रूर निकालें। 

क्या फतेहपुर सीकरी देखने लायक जगह है?

हां, बिल्कुल! आगरा से तकरीबन 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित फतेहपुर सीकरी घूमने कम से कम एक बार तो ज़रूर जाना चाहिए। लाल बालू पत्थर से बने महलों के ऊपर नायाब नक्काशी, बड़े प्रवेश द्वार, मुगलिया शैली में बने आँगन, राजा का दरबार, दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास से सजा, बादशाह अकबर द्वारा 16वीं शताब्दी में बनवाया गया नगर फतेहपुर सिकरी, अपनी पहचान और नाम पर खरा उतरता है।

फतेहपुर का शाब्दिक अर्थ है ‘विजय का स्थान’। उर्दू भाषा में ‘फतेह’ का मतलब विजय है। फतेहपुर सीकरी के साथ ढेरों पुरानी कहानियां और गाथाएं जुड़ी हुई है। सूफी संत सलीम चिश्ती को मानने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक धार्मिक स्थान होने के साथ-साथ अब यह एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी है। 

इन सब चीजों के साथ-साथ फतेहपुर सीकरी में और भी बहुत कुछ है जो यकीनन देखने लायक है। तो फिर देरी किस बात की है, तैयार हो जाइए इस खूबसूरत जगह के आकर्षण में खो जाने के लिए।

फतेहपुर सीकरी का इतिहास और वास्तुकला

तकरीबन 500 साल पहले 1571 में बादशाह अकबर ने फतेहपुर सीकरी को भारत में मुगल शासन की राजधानी के रूप में खड़ा किया था। 

सलीम चिश्ती एक सूफी रहस्यवादी संत थे जिनके बारे में बहुत से लोगों का ये विश्वास था कि वह चमत्कारी संत थे।

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फतेहपुर सीकरी को क्यों बनाया गया था?

ऐसा माना जाता है कि मुगल बादशाह अकबर ए आज़म संत सलीम चिश्ती के पास अपने तख्त के लिए एक वारिस की दुआ मांगने गए। सलीम चिश्ती ने अकबर को आशीर्वाद दिया और जल्द ही अकबर के तीन पुत्रों में से पहले पुत्र का जन्म हुआ। इसके बाद सलीम चिश्ती के सम्मान में और उन्हें धन्यवाद देने के लिए अकबर ने अपने खेमे के आस-पास ही एक बहुत विशाल और महान नगर की स्थापना करने की सोची।

अकबर ने अपने पहले पुत्र का नाम भी सलीम चिश्ती के सम्मान में सलीम रखा। मुग़ल  सल्तनत का वारिस जिसे बाद में जहांगीर के नाम से जाना गया।

एक पुरानी पहाड़ी के ऊपर अकबर का किला बनाया गया। इस किले के वैभव को देखकर ही समझ आ जाता है के अकबर को यह जगह कितनी ज्यादा पसंद रही होगी।

यहां खुला आँगन है, दरगाह है, एक बड़ी मस्जिद, बहुत सारे महल हैं जो कि उस समय की स्थानीय परंपराओं के हिसाब से अलग-अलग शैली में बने हुए हैं।

फतेहपुर सीकरी को भूतिया शहर क्यों कहा जाता है?

फतेहपुर सीकरी इंडो- इस्लामिक शैली का नायाब नमूना था पर पानी की कमी की वजह से धार्मिक महत्ता पर बना यह शाही शहर वीरान हो गया और इसीलिए इसे भूतिया शहर माना जाता है। शायद उस समय यमुना नदी का पानी इस जगह के लिए काफी नहीं रहा होगा। अब फतेहपुर सीकरी वीरान तो है पर अच्छी हालत में है। पर्यटकों और इतिहास और वास्तु कला के शौकीनों में बहुत लोकप्रिय भी है।

फतेहपुर सीकरी की यात्रा करना मुगल काल और इतिहास में वापस जाने जैसा है। यहां की सभी इमारतें मुग़ल और फ़ारसी (पर्शियन) वास्तु कला का मिलाजुला रूप हैं। फतेहपुर सीकरी की शानदार इमारतों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है- धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष।

एक तरफ सफेद संगमरमर से बने बुलंद दरवाजे के साथ भव्य जामा मस्जिद और शेख सलीम चिश्ती की दरगाह है।

दूसरी तरफ हैं बाकी महत्वपूर्ण इमारतें जैसे दीवान-ए-खास, जोधाबाई का महल, मरियम का महल, बीरबल का महल, तुर्की सुल्ताना का निवास स्थान और पंच महल। ये सब कई तरह की वास्तु शैलियों को दर्शाते हैं।

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फतेहपुर सीकरी के 6 ऐसे स्थान जहां आपको ज़रूर जाना चाहिए-

जामा मस्जिद

जामा मस्जिद को जुम्मा मस्जिद के नाम से भी जाना जाता है। फतेहपुर सीकरी उन जगहों में से एक है जहां भारत के मुस्लिम समुदाय के लोग बहुत बड़ी संख्या में आते हैं।

इस आकर्षक मस्जिद का निर्माण 1571 में पूरा हुआ। इसके छतरी नुमा गुंबद और मीरहब भारतीय और पर्शियन वास्तुशिल्प को दर्शाते हैं।

फतेहपुर सीकरी के जामा मस्जिद में जड़ी हुई मोज़ैक टाइलें उस संबंध का प्रमाण है जो कभी भारत और पर्शिया के बीच फलता फूलता था।

फूल-पत्तियों के चित्र, दीवारों पर बनी रंग-बिरंगी कलाकृतियां, इस 15वीं शताब्दी में बने मस्जिद की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। यह मस्जिद ज़रूर अकबर द्वारा बनवाई गई थी पर यह परिसर मुगलों के आने के समय से ही था।

बुलंद दरवाज़ा

भारत का सबसे विशाल द्वार ‘बुलंद दरवाज़ा’, भव्य जामा मस्जिद का प्रवेश द्वार है। बुलंद दरवाज़े को एशिया के सबसे बड़े प्रवेश द्वार के रूप में भी जाना जाता है। बुलंद दरवाज़ा यूनेस्को द्वारा जारी की गई वर्ल्ड हेरिटेज स्ट्रक्चर्स की सूची में शामिल अति महत्वपूर्ण इमारतों में से एक है।

दक्षिण में अकबर की विजय की यादगार के रूप में 1575 में इस द्वार का निर्माण किया गया था। यह विशालकाय द्वार पर्शियन और मुगल वास्तुकला का खूबसूरत मेल है। इस 54 मीटर ऊँचे दरवाज़े को बनाने में 5 वर्ष का समय लगा।

इस दरवाज़े पर बहुत ही खूबसूरती से बड़े-बड़े अरबी अक्षरों में कुरान की आयतें उकेरी गईं हैं। इसमें से गुज़रने वाले रास्ते में दो शिलालेख हैं और बीच में तीन मेहराबदार प्रवेश द्वार हैं जिन में बीच वाला सबसे बड़ा है

“मरियम के पुत्र ईशा ने कहा: संसार एक पुल है इसके ऊपर से गुजरो पर इस पर कोई मकान मत बनाओ। वह जो 1 घंटे के लिए उम्मीद लगाता है हमेशा के लिए भी उम्मीद लगाए रख सकता है।” ये प्रवेश द्वार पर उकेरे गए वो शब्द हैं जो कि अकबर की अन्य धर्मों के प्रति आत्मीयता और सहनशीलता को दर्शाते हैं। बीच वाले मेहराब में खुशकिस्मती के लिए अभी भी एक घोड़े की नाल लगी हुई है जिसके वजह से इसे स्थानीय लोग ‘घोड़े की नाल वाला दरवाज़ा’ के नाम से भी जानते हैं।

सलीम चिश्ती का मकबरा

इस मस्जिद के इलाके में ही सलीम चिश्ती की दरगाह या मकबरा भी बना हुआ है। ये वो सूफी संत हैं जिन्होंने अकबर के शासन और उसके विचारों को बहुत प्रभावित किया।

संत के मकबरे को चारों तरफ से घेरती संगमरमर से बनी एक मंजिला इमारत है।

मोती की सीप से बने और लकड़ी  में जड़े सुन्दर मोज़ेक कैनोपी में चमकते हैं।

इस मकबरे पर इससे पहले के गुजरात राजवंश के वास्तुशिल्प का असर नजर आता है। संगमरमर से बने इस खूबसूरत मकबरे पर हजारों लोग शेख सलीम चिश्ती से दुआएँ मांगने आते हैं।

ट्रेवल टिप्स-

मकबरे के परिसर में जाने वालों के लिए सर ढकना ज़रूरी है।

इसी परिसर में चिश्ती परिवार की और भी बहुत सी कब्र हैं। कुछ कब्रों पर अस्पष्ट-से फारसी नाम और समय का उल्लेख नज़र आता है और कुछ बेनाम हैं।

यहां ऐसे लोगों से सावधान रहना ज़रूरी है जो आपको मज़ार पर चढ़ाने के लिए एक कपड़ा खरीदने को कहेंगे जो आपके लिए सौभाग्य लेकर आएगा। इसके लिए वह आपसे हजार रुपए तक मांग सकते हैं। जबकि बाद में वही कपड़ा ये लोग वापस लेकर फिर से किसी अन्य भोले-भाले टूरिस्ट को बेच देते हैं।

अगर आप ऐसा कोई चढ़ावा नहीं चढ़ाना चाहते तो गाइड को पहले ही यह बात समझा दें कि आपको चादर नहीं खरीदनी है ताकि वह आपको ऐसे लोगों के पास ना लेकर जाए।

दीवान-ए-खास 

दीवान-ए-खास वह शाही दरबार था जहां अकबर अपने नवरत्न यानी उसके राज्य के 9 स्तंभ, मुगल दरबार के 9 खास मंत्रियों से मंत्रणा करता था। बीरबल अकबर के दरबार के प्रसिद्ध नामों में से एक हैं।

दीवान-ए-खास में अकबर के निजी कक्ष की वास्तुकला में अकबर की उन विभिन्न अच्छाईयों का वर्णन है जिन्हें उसने अपने शासन काल में लागू किया था।

इस कक्ष को ख़ास नए तरीके से बनाया गया है। शाही दरबार के बीचोंबीच एक मज़बूत स्तंभ खड़ा है जो बाकी दरबार के बाकी कोनों को जोड़ता है और विभिन्न विचारों और विश्वास के मेलजोल को बखूबी दर्शाता है।

दीवान-ए-खास अन्य भारतीय दरबारों के लिए मील के पत्थरों में से एक के रूप में प्रसिद्ध रहा है। ये लकड़ी की नक्काशी और विस्तृत डिज़ाइन से बना है।

जोधाबाई महल

यहां के सबसे बड़े महल में अकबर की रानी जोधा बाई रहती थी। जोधा बाई बादशाह अकबर की पहली राजपूत रानी थी।  हालांकि राजपूत राजकुमारी हीर कुंवर से विवाह के पहले भी अकबर की दो मुगल बीवियां और अन्य कई बीवियां भी थीं।

ऐसा माना जाता है कि जोधा बाई को हीर कुंवर, हीरा कुंवरी आदि नामों से भी जाना जाता था और वह अगले मुगल बादशाह जहांगीर की मां थीं।

हालांकि ‘तुजुक-ए-जहांगीरी’, जहांगीर की आत्मकथा में कहीं भी जोधाबाई, हरका बाई या हीर कुंवर नाम का उल्लेख नहीं है। वहां उसे मरियम उज ज़मानी नाम दिया गया है।

बादशाह अकबर से विवाह के बाद भी जोधाबाई अपने धर्म के प्रति समर्पित रहीं और महल के अंदर ही बने एक मंदिर में अपने ईश्वर की आराधना करती रहीं। उस समय में यह धार्मिक सहनशीलता की ओर एक शुरुआती कदम था।

जोधाबाई के महल में हिंदू और मुगल वास्तुशैली का विरोधाभास नजर आता है। इस महल की वास्तुकला में गुजरात, मांडू और ग्वालियर की वास्तुकला को पारंपरिक इस्लामिक डिज़ाइन के साथ मिला दिया गया है। 

यहां की नीली टाइलों वाली छत ही एक ऐसी चीज़ है जो फतेहपुर सीकरी में रंगो की छटा बिखेरती है।

यहां आपको राजपूती निशान जैसे श्रीवतसा, फूल, कमल, हाथी, तोते और हंस आदि जोधाबाई के महल की खूबसूरती बढ़ाते हुए दिख जाएंगे।

पंचमहल

फतेहपुर सीकरी के प्रांगण में पंचमहल है। इस बड़े और खुले मैदान का इस्तेमाल शाही हरम की औरतों के मनोरंजन के लिए किया जाता था।

पंचमहल एक पांच- मंजिला खुला हुआ ढांचा है जिसकी हर मंजिल पर खंबो पर टिका हॉल  है जो अपने नीचे वाली मंजिल से छोटा है। यहां खूबसूरत नक्काशी वाले 176 लाल बालू पत्थरों से बने स्तंभ है।

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फतेहपुर सीकरी कैसे पहुंचें ?

फ्लाइट

आगरा एयरपोर्ट फतेहपुर सीकरी का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है जो कि शहर से तकरीबन 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

बस

पब्लिक ट्रांसपोर्ट से फतेहपुर आना आसान है। सड़क मार्ग से फतेहपुर सीकरी पहुंचना अच्छा विकल्प है क्योंकि यह बाकी मुख्य शहरों से जुड़ा हुआ है।

ईदगाह बस स्टैंड आगरा का मुख्य बस स्टैंड है जहां से दिल्ली, जयपुर, मथुरा, फतेहपुर सीकरी इत्यादि के लिए बस ली जा सकती है। ईदगाह बस स्टैंड, आगरा से फतेहपुर सीकरी के लिए सुबह 7:00 बजे सरकारी बस चलती है।

कार/ बाइक

आप किराए पर कार लेकर भी फतेहपुर सीकरी जा सकते हैं जो कि बढ़िया और आरामदायक है। आने-जाने के लिए इस समय का रेट 1800 रुपए है। ड्राइवर से पहले ही इस बारे में बात कर लें कि वह आपको आसपास की जगहों जैसे कि सिकंदरा (अकबर का मकबरा), मरियम बीबी (अकबर की ईसाई बीवी) का मकबरा आदि पर लेकर जाये।

और अगर आप चाहें तो बाइक भी किराए पर ले सकते हैं और गूगल मैप का इस्तेमाल करते हुए फतेहपुर सिकरी पहुंच सकते हैं। एक हाईवे आगरा को फतेहपुर से जोड़ती है और सड़क की हालत अच्छी है।

ट्रेन

मुख्य रेलवे स्टेशन आगरा कैंटोनमेंट में है जो कि भारत के अन्य मुख्य शहर जैसे दिल्ली, वाराणसी और राजस्थान के कई मुख्य शहरों से जुड़ा हुआ है।

खुलने और बंद होने का समय

  • मरियम का महल
  • दिन: रविवार से शनिवार
  • समय: सूर्योदय से सूर्यास्त
  • सूर्यास्त होने के बाद 6:00 बजे तक आपको महल से जाना होगा।

भारत जैसी घनी आबादी वाले देश में भी यह शहर तब भी सुनसान था और अब भी वैसा ही खाली और सुनसान है।

प्रवेश शुल्क

  • फतेहपुर सीकरी के लिए प्रवेश शुल्क भारतीय वयस्कों के लिए ₹40 है।
  • विदेशी पर्यटकों के लिए टिकट का मूल्य ₹550 है।
  • कैमरा के लिए अलग से शुल्क देना होगा।
  • परिसर में ट्राइपॉड ले जाना मना है।
  • दरगाह में प्रवेश का कोई शुल्क नहीं है।
  • फतेहपुर सीकरी घूमने में लगने वाला समय

शाही महल को सही ढंग से देखने और उसकी शान-औ-शौकत को महसूस करने के लिए आप को कम से कम 4 घंटे का समय यहां ज़रूर बिताना चाहिए।

यहां कई महल, आँगन और शाही वैभव का एहसास करवाते, बचे हुए अंश हैं। अगर आपको इतिहास और संस्कृति से लगाव है तो आप आसानी से फतेहपुर में कम से कम आधा दिन तो बिता ही सकते हैं।

फतेहपुर सीकरी घूमने का सबसे अच्छा समय

अक्टूबर से मार्च का समय फतेहपुर सीकरी घूमने के लिए सबसे अच्छा समय है। बढ़िया ठंडे मौसम में आप आराम से सारा दिन यहां घूम सकते हैं। गर्मियों में आगरा और फतेहपुर सीकरी ना आना ही बेहतर रहेगा क्योंकि उत्तर भारत में बहुत भीषण गर्मी पड़ती है।

शुक्रवार को छोड़कर कोई भी दिन फतेहपुर सीकरी घूमने के लिए सही है। शुक्रवार का दिन जुम्मे की नमाज़ का दिन होता है इसलिए दरगाह का आंगन श्रद्धालुओं से भरा रहता है। अगर आपको लोगों को देखना-समझना पसंद है तो यह समय भी आपके लिए सही है। हफ्ते के बाकी दिन यहां काफी शांतिपूर्ण माहौल रहता है।

फतेहपुर सीकरी के लिए ट्रैवल टिप्स

  • तरह-तरह का सामान बेचने वाले लोग आपके पीछे पड़ सकते हैं ताकि आप उनसे सामान खरीदें। उन्हें सख्ती से मना करें और आगे बढ़ जायें।
  • क्योंकि फतेहपुर सीकरी में कई धार्मिक स्थान है इसलिए आपको अपनी बाहें ढकनी होंगी। कोई भी ड्रेस जो आपको गले से घुटनों तक ढके, यहां के लिए सही रहेगी।
  • आप जूते पहन कर अंदर नहीं जा सकते हैं पर अपने जूतों को उतार कर उन्हें हाथ में लेकर घूम सकते हैं।
  • अगर आप अकेले यहां घूमने आए हैं तो मेरी सलाह रहेगी कि आप सूरज ढलने से पहले ही यहां से वापसी कर लें।
  • आगरा में ठहरना और फतेहपुर सीकरी के लिए वहां से दिन का ट्रिप बढ़िया रहेगा क्योंकि यह आगरा से काफी दूरी पर है और यहां रात को करने के लिए कुछ खास नहीं है। जबकि आगरा में बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहां आप रात को भी जा सकते हैं।

फतेहपुर सीकरी में क्या खरीदें?

फतेहपुर सीकरी स्मारकों के पार्किंग एरिया के आस-पास की दुकानों में सब कुछ बहुत ज्यादा महँगा है। पर यहां मोलभाव करना आम है।

अगर आपको कुछ खरीदना ही है तो मेरी सलाह है कि आप यहां से खूबसूरत नक्काशीदार संगमरमर से बना ज्वेलरी बॉक्स या लैंपशेड खरीद सकते हैं। आगरा की प्रसिद्ध चमड़े की जूतियां भी यहां मिलती है। हालांकि इन दुकानों में मेरा ध्यान हमेशा संगमरमर के बने ताजमहल के छोटे प्यारे स्वरूप की तरफ ही जाता है।

क्या फतेहपुर सीकरी में गाइड की जरूरत है?

मेरी सलाह में फतेहपुर सीकरी के लिए गाइड लेना बहुत अच्छा रहेगा। चार लोगों तक के समूह के लिए एएसआई 2 घंटे के लिए एक गाइड देता है। इन्हें यहां की बहुत अच्छी जानकारी होती है और यह आपको इस विशाल किले का हर कोना और हर जगह दिखाते हैं।

चार लोगों के समूह के लिए आपको ₹450 देने होंगे जोकि चार लोगों में बंटने पर बहुत ही किफायती हो जाता है। इस बात का ध्यान रखें कि गाइड टिकट काउंटर से ही लें।

यहां बहुत से ऐसे बच्चे मिल जाएंगे जो आपको ₹20 मैं यहां की जानकारी देने की बात कहेंगे पर पुलिस को देखते ही एकदम गायब हो जाएंगे। यहां घुमाने के लिए इन बच्चों को पैसे बिल्कुल ना दें।

फतेहपुर सीकरी में शौचालय सुविधा

किले के प्रांगण में और दरगाह में भी शौचालय की सुविधा है। आपको इसका इस्तेमाल करने के लिए ₹5 देने होंगे और आपको टिशु रोल भी मिलेगा।

हिमाचल प्रदेश का त्रिउंड ट्रेक मेरा पहला ट्रैक था। ऊंचे-नीचे देवदार और बुरांश से भरे, पथरीली पगडंडियों की ओर जाते घुमावदार रास्ते अभी तक मेरे ज़हन में ताजा हैं।मेरे trekking tips से आप भी Triund Trek को बड़ी आसानी से कर सकते हैं।और पढ़ने के लिए क्लिक करें : त्रिउंड ट्रेक(Triund Trek): हिमाचल प्रदेश का आसान पर रोमांचक ट्रेक।

फतेहपुर सीकरी व्हीलचेयर अनुकूल

यह किला बहुत ही बड़ी जगह में बना हुआ है और ज्यादातर जगहों पर व्हीलचेयर से जाया जा सकता है। बुलंद दरवाजे पर भी व्हील चेयर के लिए ढलान वाला रास्ता बना हुआ है।

चूँकि फतेहपुर सीकरी एक यूनेस्को धरोहर स्थल है, इस किले की देखरेख का ज़िम्मा एएसआई के पास है जो कि इसका बहुत सुचारु रुप से ध्यान रख रहे हैं और यहां आने वाले लोगों के लिए अच्छी सुविधायें प्रदान करते हैं।

मुझसे पूछें तो मेरी राय रहेगी कि आगरा घूमने के लिए आप फतेहपुर सीकरी से शुरुआत करते हुए मुगल इतिहास को समझें और फिर आगरा की तरफ बढ़े।

पहले फतेहपुर, फिर आगरा का किला और फिर ताजमहल, यह क्रम मुगल संरक्षण में कला और संस्कृति की ऊंचाइयों को सही ढंग से दर्शाता है।

आलीशान बुलंद दरवाज़े से जिस की शुरुआत होती है वो यात्रा तब पूरी होती है जब आप खुद को ताज महल के सामने खड़ा पाते हैं।

आगरा का खूबसूरत ताजमहल देखने के बाद अगर आप सोच रहे हैं कि इसके बाद कहाँ जायें तो मैं आपको यही सलाह दूँगी कि आप उत्तर प्रदेश के फतेहपुर सीकरी में बसी मुगल शासन की खूबसूरत पर अब वीरान हो चुकी राजधानी को देखने के लिए एक दिन ज़रूर निकालें #lighttravelaction #fatehpursikri #agra #uttarpradesh #hinditravelblog #hindi #hindiblog
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